राठौड़ वंश (Rathore clan)-Education Fact

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राठौड़ों की उत्पत्ति से संबंधित मत

राठौड़ों की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकार एकमत नहीं है अनेक इतिहासकारों ने इस संबंध में अपने-अपने मत प्रस्तुत किए हैं जिसमें प्रमुख मत निम्नलिखित हैं—

राजस्थान के आधुनिक इतिहासकार डॉक्टर गोपीनाथ शर्मा के अनुसार– मारवाड़ के राठौड़ राष्ट्रकूट वंश से संबंधित हैं

मुहणोत नैणसी ने- इन्हें कन्नौज के जयचंद गढ़वाल का वंशज माना है इस मत का समर्थन दयालदास री ख्यात और पृथ्वीराज रासो में भी किया गया है

सर्वप्रथम डॉक्टर हार्नली ने— राठौड़ों को गहड़वाल वंश से पृथक माना है

डॉक्टर गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार- राठौड़ बदायूं के राठौड़ वंश का वंशज है

जोधपुर राज्य की ख्यात में– राजा विश्वुतमान के पुत्र वृहदबल से राठौड़ों की उत्पत्ति मानी है

1596 में लिखित राठौड़ वंश महाकाव्य में–राठौड़ों की उत्पत्ति भगवान शिव के शीश पर स्थित चंद्रमा से बताई गई है

राठौड़ वंश (Rathore clan)-Education Fact
राठौड़ वंश (Rathore clan)-Education Fact 1

कर्नल जेम्स टॉड ने ख्यातो के आधार पर- राठौर को जयचंद्र गढ़वाल का वंशज माना है

राज रत्नाकर और कुछ जाटों के अनुसार–हिरण्यकश्यप की संतान माना गया है

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दयालदास के अनुसार– Suryavanshi/ब्रह्मम्णा के भल्लराव की संतान माना है (राजेश्वरी देवी के नाम पर)

फलौदी के( 1555) शिलालेख के अनुसार– जयचंद्र गढ़वाल राठौर का आदि पुरुष माना गया है

राठौड़ राज्य का इतिहास

राजस्थान में अरावली के पश्चिम में स्थित क्षेत्र मारवाड़ के नाम से जाना जाता है प्राचीन काल में यह क्षेत्र मरूप्रदेश कहलाता था मारवाड़ शब्द मारवाड़ का विकृत रूप है मारवाड़ का वास्तविक नाम मरुस्थल या मरु उत्थान (मृत्यु का प्रदेश) है

इस क्षेत्र में जोधपुर, बीकानेर, बाड़मेर, जालौर, नागौर, किशनगढ़ और पाली क्षेत्र सम्मिलित है यहां प्रारंभ में गुर्जर प्रतिहार वंश और उसके पश्चात राठौर वंश का शासन हुआ जो राजस्थान के निर्माण तक रहा

राठौर शब्द भाषा में एक राजपूत जाति के लिए प्रयुक्त हुआ है जिसे संस्कृत में राष्ट्रकूट कहते हैं राष्ट्रकूट का प्राकृतिक रूप रट्टऊड है। जिससे राडउड या राठौड़ बनता है

अशोक के शिलालेख में कुछ दक्षिण जातियों के लिए रिस्टिक लटिक और रटिक शब्दों का प्रयोग किया गया था यह सभी शब्द रट्ट शब्द के प्राकृत रूप हैं जो राष्ट्रकूट शब्द से मेल खाते हैं इसका तात्पर्य यह है कि राठौड़ शब्द राष्ट्रकूट से संबंधित है और उस जाति विशेष के लिए उपयुक्त हूआ है जो दक्षिण में राष्ट्रकूट नाम से विख्यात थी

राठौर वंश की शाखाएं

अशोक के समय से लेकर आज तक हमें इस वंश के संबंध में जानकारी अवश्य प्राप्त होती है यह भी निर्विवाद है कि राष्ट्रकूटों (राठौरों) का बड़ा प्रतापी राज्य सर्वप्रथम दक्षिण में था दक्षिण के राष्ट्रकूटों की वंशावली दंती वर्मा से आरंभ होती है जो लगभग 6ठी शताब्दी में प्रतापी शासक था

इनके ऊपर की 3 शाखाओं के राठौड़ दक्षिण के राठौड़ों के ही वंशज हो जाते हैं—

हस्ती कुंड के राठोर गॉडवाड इलाके में राज्य करते थे

जबकी कन्नौज में गढ़वाल शासन करते थे तो

राष्ट्रकूटों की एक शाखा बदायूं में राज्य करती थी ।इस राज्य का प्रवर्तक चंदू था

बदायूं के शिलालेख में वोदामयुता बदायूं का प्रथम शासक और गढ़वाल के चंद्र देव को गाधीपुर (कन्नौज )का विजेता लिखा है यदि गढ़वाल और बदायु भी दोनों राठौर वंशीय होते तो इनका परस्पर विवाह संबंध नहीं हो सकता था

कैप्टन लुअर्ड,डॉ राम शंकर त्रिपाठी और हेमचंद्र राय ने गहड़वालों और राठौड़ के वंशो को भिन्न बताया है इन बातों पर विचार करने से तो हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि गढ़वाल और राठौर दो भिन्न-भिन्न जातिया हैं और उनमें परस्पर किसी प्रकार की समानता नहीं है

पंडित रेऊ भी मारवाड़ के राठौड़ो को कन्नौज के मानते हैं और इन्हें जयचंद के वंशज बताते हैं

डॉक्टर माथुर एक नया मत स्थिर रख करते हुए लिखते हैं कि– बदायूं के राष्ट्रकूट कन्नौज से बदायूं गए और दक्षिण राष्ट्रकूटों का 1200 ईस्वी के लगभग कन्नौज पर शासन रहा कन्नौज से राठौड़ों की एक शाखा बदायूं गई और दूसरी शाखा मारवाड़ आई जयचंद्र मारवाड़ के राठौड़ का आदि पुरुष था और राठौड़ और गहढ़वाल के वंशो में साम्यता रही

राजस्थान के राठौड़

राजस्थान के राठौड़, हस्तिकुंडी के राठौड़, धनोप के राठौड़, वागड़ के राठौड़, जोधपुर के राठौड़ और बीकानेर के राठौड़ के नाम से विख्यात है।

जोधपुर के राठौड़ ( Rathod of Jodhpur)

जोधपुर रियासत क्षेत्रफल की दृष्टि से राजपूताना एजेंसी की सबसे बड़ी रियासत थी यहां राठौरों का राज्य था  स्वतंत्रता पूर्व केवल कश्मीर एवं हैदराबाद सियासत ही जोधपुर सियासत से बड़ी थी

राजस्थान के उत्तरी व पश्चिमी भागों में राठौड़ वंश के राजपूतों का साम्राज्य स्थापित हुआ जिसे मारवाड़ कहते हैं राठौड़ का शाब्दिक अर्थ राष्ट्रकूट होता है जो दक्षिण का एक राजवंश है। जोधपुर राठौड़ों का मूल स्थान कनौज था।

राठौड़ वंश- जोधपुर के राठौड़

  • राव सीहा
  • राव चूड़ा
  • राव जोधा(1438-1489)
  • राव मालदेव(1531-1562)
  • राव चंद्रसेन(1562-1581)
  • मोटा राजा राव उदयसिंह(1583-1595)
  • महाराजा जसवंत सिंह प्रथम(1638-1678)
  • महाराजा अजीतसिंह
  • महाराजा मानसिंह(1803-1843)

वर्तमान राठौड़ो का मूल पुरुष-राव सीहा

राज्य के वर्तमान राठौड़ों का मूल पुरुष राव सिहा था। जो बदायूं के राठौरों का वंशधरया कन्नौज के गहड़वाल वंश का अथवा हथुंडी के राष्ट्रकूटों की शाखा से संबंधित कोई व्यक्ति था। राव सीहा को राजस्थान में राठौड़ राजवंश का संस्थापक माना जाता था

बीठू गांव पाली के देवल अभिलेख के अनुसार राव सीहा कुंवर सेतराम(खेतराम) का पुत्र वह जयचंद का भतीजा था और उसकी सोलंकी वंश की पार्वती नामक रानी थी मारवाड़ में अपना पहला पड़ाव बीकानेर के कोल्हूमठ नामक गांव में डाला था

राव सीहा ने सोलंकी सरदार की मदद कर लाखा फुलानी पर विजय प्राप्त कर उसकी बहन से विवाह किया था

राव सीहा की मृत्यु 1273 में तब हुई जब वह अपनी द्वारिका यात्रा के दौरान मुसलमानों के विरुद्ध पाली प्रदेश की रक्षा के लिए मुस्लिम शासक फिरोज शाह द्वितीय/ नसरुद्दीन मोहम्मद से युद्ध किया था उस ने पाली के आसपास राठौर वंश की स्थापना की उसके पुत्र आसनाथ ने मूंदोच गांव में अपनी शक्ति का संगठन किया

राव सीहा द्वारा पाली की रक्षा के लिए मुस्लिम शासक फिरोज शाह द्वितीय/नसरुद्दीन मोहम्मद से किया गया युद्ध लाखा झंवर के नाम से जाना जाता है और यह स्थान धौला चोतरा कहलाता है विठू पाली गांव के शिलालेख से 9 अक्टूबर 1273 को मुसलमानों के विरुद्ध गौ रक्षा हेतु शहीद हो गए थे

आसनाथ 1273-1291

आसनाथ ने कोलू मंड सोलंकी की बहन पार्वती सोलंकी और राव सीहा का पुत्र था। आसनाथ ने मूंदोच नामक गांव में अपनी शक्ति का संगठन किया आसनाथ और जलालुद्दीन खिलजी की सेना में पाली की रक्षा के लिए 1291 में युद्ध हुआ जिसमें आसनाथ 140 साथियों सहित वीरगति को प्राप्त हुआ

धूहड़

आसनाथ का पुत्र धूहड़ खेड का स्वामी बना।धूहड़ ने राठौड़ों की कुलदेवी चक्रेश्वरी (नागणेची) की मूर्ति कर्नाटक से लाकर नागणा गांव बाड़मेर में स्थापित करवाई थी रायपाल वीरमदेव मल्लीनाथ राठौड़ वंश के शासक बने

वीरमदेव

वीरमदेव सीहा का वंशज था इसकी मृत्यु जोहिंयो से लड़ते हुए 17 अक्टूबर 1383 को हुई इसकी मृत्यु की यह तिथि बीकानेर के गजनेर गांव के एक चबूतरे पर लगी हुई देवली के लेख में भी दर्ज है वीरमदेव का उत्तराधिकारी उसका पुत्र राव चूंड़ा हुआ

राव चूंडा़-1394-1423

वीरम देव के द्वित्तीय पुत्र राव चूड़ा को इस वंश का प्रथम प्रतापी शासक माना जाता है अपने पिता विरमदेव की मृत्यु के समय राव चूड़ा मात्र 6 वर्ष का था अतः उसकी माता द्वारा उसे कलाऊ के आल्हा चारण की संरक्षता में गुप्त रूप से रखा गया था और कुछ समय पश्चात उसे अपने चाचा मल्लीनाथ के पास भेज दिया गया

मल्लीनाथ द्वारा उसे सालोड़ी गांव की जागीर प्रदान की गई इन्होने मल्लीनाथ और इंदिरा परिहार के सहयोग से मांडू के सूबेदार से मंडोर दुर्ग छीना और मंडोर को अपनी राजधानी बनाया इसने अपने राज्य का विस्तार नागौर डीडवाना नाडोल आदि क्षेत्रों तक कर लिया

परिहारो के साथ अपने संबंधों को एक निश्चित आधार प्रदान करने के कारण राव चूड़ा को मारवाड़ में सामंत प्रथा को प्रारंभ करने का श्रेय दिया जाता है राव चूड़ा ने नागौर के सूबेदार जलाल खा खोखर को पराजित कर नागौर पर अधिकार कर लिया और मंडोर की देखरेख का कार्य अपने पुत्र सत्ता(सदा)के हाथों में सौंप कर स्वयं नागौर रहने लगा उसने नागौर के समीप ही चूंड़ासर नामक कस्बा बसाया ।

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राव चूंडा़ ने अपनी मोहिलाणी रानी किशोर कुँवरी के प्रभाव में आकर अपने बड़े पुत्र रणमल के स्थान पर छोटे पुत्र कान्हा को अपना उत्तराधिकारी बनाया जिससे नाराज होकर रणमल मेवाड़ राणा लाखा की शरण में चला गया

राव चूड़ा की सोनगरी रानी चांद कंवर ने जोधपुर में प्रसिद्ध चांद बावड़ी का निर्माण करवाया था जिसे चांद बावड़ी कहा जाता है. जबकि प्रशिद्ध चाँद बावड़ी आभानेरी(दौसा) में स्थित है

राव चूंडा ने अपनी पुत्री हंसा का विवाह मेवाड़ के राणा लाखा के साथ हुआ जिससे मोकल का जन्म हुआ।

तुर्की आक्रमण राव चूंड़ा के समय आरंभ हुआ

वीर विनोद और जोधपुर की ख्यात के अनुसार ईंदो ने स्वयं मंडोवर विजय कर बाद में उसकी समुचित रुप से रक्षा करने में असमर्थ होने के कारण और इंदिरा शाखा के परिवारों ने अपने गांव 84 गांव में हस्तक्षेप न करने के उद्देश्य से प्रतिहारों के नेता रायधवल की पुत्री से राव चूड़ा का विवाह कराकर मंडोर दुर्ग राव चूड़ा को दहेज में दिया गया था और इंदिरा शाखा के प्रति हार मंडोर में राव चूड़ा के सामंत बन गए और इसी के काल में सामंत प्रथा की शुरुआत हुई और जिसका विकास राव जोधा के समय हुआ

भाटियों ने राव चूड़ा को संधि के लिए बुलाया जो ही राव चूड़ा वहां पहुंचा तो सभी ने मिलकर 15 मार्च 1423 को युद्ध में लड़ते हुए राव चूड़ा को मार दिया राव चूड़ा के छोटे पुत्र कान्हा का उत्तराधिकारी उसका भाई सत्ता हुआ

चुड़ा के पुत्र रणमल की हत्या मेवाड़ के सामन्तों द्वारा धोखे से (सोते हुए चारपाई से बांधकर) सन 1438 में चित्तौड़ में की गई.। एक नगारसी द्वारा रणमल के पुत्र जोधा को चेतावनी दी गई। जिससे वह बच निकला- “जोधा भाग सके तो भाग थारो रिड़मल मारयो जय”

राव जोधा

राव जोधा, रणमल का पुत्र था। राव जोधा ने मेवाड़ के अक्का सिसोदिया या अहाडा हिंगोला को हराकर मंडोर पर पुनः अधिकार किया।उसने अपनी पुत्री का विवाह कुंभा के पुत्र रायमल से कर मेवाड़, मारवाड़ वैमनस्य कम किया

राव जोधा सन 12 मई, 1459 जोधपुर नगर की स्थापना कर अपनी राजधानी बनाया, तथा “चिड़ियाटूक पहाड़ी” पर दुर्ग (मेहरानगढ़) बनवाया, जोधा के पांचवें पुत्र बीका 1465 ईस्वी में “बीकानेर राज्य”की स्थापना की

मेहरानगढ़ दुर्ग के अंदर राव जोधा ने चामुंडा देवी के मंदिर का निर्माण कराया, जबकि मारवाड़ की कुलदेवी के रूप में नागणेची देवी को माना जाता है।

मारवाड़ के राव जोधा ने नियमित सामन्तवाद को अपनाया था सामन्तवादी व्यवस्था का उल्लेख गंगधार शिलालेख झालावाड़ में मिलता है

राव जोधा की रानी जसमादे ने जोधपुर में रानीसर झील का निर्माण करवाया।

राव जोधा के बाद उसका पुत्र सातलदेव,उसके पश्चात उसका भाई सूजा, सूजा के बाद बाधा तथा बाधा के बाद उसका पुत्र गंगा जोधपुर का शासक बना राव गंगा का राजतिलक बगड़ी के ठाकुर ने तलवार से अपने अंगूठे का चीरा लगाकर रक्त से किया

राव मालदेव (1532-1562)

राव मालदेव, राव गंगा का बड़ा पुत्र था, जो गंगा की हत्या कर मारवाड़ का शासक बना।  जिन्होंने मुगल साम्राज्य के प्रारंभिक चरणों में हुमायूं के साथ सहयोग से इंकार कर दिया था। मुस्लिम इतिहासकारों ने उन्हें “हिंदुस्तान का सबसे शक्तिशाली शासक” और “हशमत वाला शासक” कहा था।

पाहोबा का युद्ध-1542 ई – बीकानेर के राजा जैत सिंह तथा जोधपुर के शासक राव मालदेव के मध्य यह युद्ध हुआ, इस युद्ध में जैत सिंह मारा गया, इसका पुत्र कल्याण मल, बीकानेर से भागकर शेरशाह सूरी के दरबार में शरण ली,

इस युद्ध में राव मालदेव के सैनिक कुम्पा मारवाड़ की सेना का सफल नेतृत्व किया इस विजय के उपरांत कुंपा को डीडवाना तथा झुंझुनू की जागीर व बीकानेर की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी प्रदान की

1540 ईस्वी के बिलग्राम युद्ध के बाद ही उपलब्धि प्राप्त हुई मेड़ता के वीरमदेव तथा बीकानेर के कल्याणमल इन दोनों शासकों ने शेरशाह सूरी को मारवाड़ पर आक्रमण करने के लिए उकसाया था

1542 में मुगल सम्राट हुमायूं शेरशाह सूरी से पराजित होने के उपरांत राव मालदेव ने हुमायूं को उचित सहायता तथा बीकानेर का परगना जागीर में देने का प्रस्ताव रखा लेकिन हुमायूं शेरशाह सूरी के भय के कारण बीकानेर में रहकर अमरकोट चला गया

राव मालदेव के शासन की सबसे महत्वपूर्ण घटना सामेल/ गिरी /सुमेल जैतारण का युद्ध माना जाता है. इस युद्ध में राव मालदेव को अपना राज्य खोना पड़ा तथा मारवाड़ को छोड़कर सिवाना के दुर्ग में जाना पड़ा

सुमेल या गिरी सुमेल युद्ध-1544ई –  जनवरी 1544 ईस्वी में शेर शाह सूरी अपनी सेना को लेकर डीडवाना पहुंचा, डीडवाना पहुंचते ही मालदेव के सेनापति कूंपा ने यह खबर अपने राजा मालदेव को दी कि शेरशाह सूरी एक विशाल सेना के साथ सुमेर नामक स्थान पर आक्रमण करने के लिए आ पहुंचा है

माल देव भी एक विशाल सेना के साथ उसी स्थान पर जा पहुंचा तथा शेरशाह सूरी पर चढ़ाई कर दी दोनों सेनाओं के बीच युद्ध हुआ, जिसमें राजपूत सेना का नेतृत्व राव मालदेव के विश्वासपात्र सेनानायक “जेंता-कुपा” के हाथों में था

शेरशाह सूरी की सेना का नेतृत्व सेनापति जलाल खान जगवानी के हाथों में था शेरशाह सूरी की सेना जब युद्ध में हताश वह निराश हो गई तब युद्ध भूमि में ही शेरशाह सूरी नमाज पढ़ने लगा, इस स्थिति के बाद युद्ध में शेरशाह सूरी का पलड़ा भारी हो गया

लेकिन युद्ध के अंतिम क्षणों में राजपूत सेना असफल हुई सुमेल के युद्ध में राव मालदेव के विश्वासपात्र सेनानायक “जेता-कुम्पा” वीरगति को प्राप्त हुए अंतिम रूप से इस युद्ध में विजय शेरशाह सूरी को ही प्राप्त हुई

मुस्लिम इतिहासकार बदायूनी ने अपने ग्रंथ “मुंतखाब उत-तवारीख” तथा अब्बास खान शेरवानी ने अपने ग्रंथ “तारीख ए शेरशाही” में युद्ध का आंखों देखा हाल लिखा था

1544 ईस्वी के बाद राव मालदेव जोधपुर को छोड़कर सिवाना चले जाते हैं जब तक शेरशाह सूरी की मृत्यु नहीं हो जाती, तब तक वह सिवाना दुर्ग में ही रहे, इस दौरान राव मालदेव ने जोधपुर का शासन खवास खान को सौंपा था

सुमेल के युद्ध के बाद शेरशाह सूरी ने स्वयं यह लिखा था कि- “मैंने मुट्ठी भर बाजरे के लिए हिंदुस्तान की बादशाहत खो दिया होता” क्योंकि शेरशाह सूरी ने छोटे से राज्य को प्राप्त करने के लिए दिल्ली की समस्त सेना को इस युद्ध में झोंक दिया फिर भी विजय शेरशाह सूरी को नहीं दिख रही थी

वर्तमान में सुमेल नामक स्थान पाली जिले में स्थित है सुमेल के युद्ध को जैतारण का युद्ध कहा जाता है। यह स्थान भी पाली में है।

मारवाड़ की ख्यात के अनुसार मालदेव 52 युद्धों का विजेता था, केवल सुमेल युद्ध में हारे थे।

मालदेव ने उदय सिंह को मेवाड़ का शासक बनाने में मदद की।

जेतां व कुंपा- मालदेव के दो वीर सेनानायक

मारवाड़ के इस शासक को फारसी इतिहासकारों ने विशेषकर “अब्बास खान शेरवानी” ने अपने ग्रंथ “तारीख-ए-शेरशाही’ में राव मालदेव को “हसमत वाला राजा” के नाम से संबोधित किया। इस का शासनकाल (1531-62 ई.) ईसवी तक माना जाता है, राव गंगा की मृत्यु के पश्चात मालदेव का राज्याभिषेक “सोजत के किले” में हुआ मालदेव अपने राज्याभिषेक के 1 वर्ष बाद जोधपुर आया.

बदायूनी ने “मुंतखाब-उत- तवारीख” लिखा

राव मालदेव जोधपुर आते ही अपने विस्तारवादी नीति को अपनाने लगे, जिसके तहत 1533 ईस्वी में नागौर, मेड़ता के शासक वीरमदेव भय के कारण दिल्ली के सुल्तान शेरशाह सूरी के दरबार में चला जाता है, जो गिरी सुमेल के युद्ध का प्रमुख कारण माना जाता है.

जोधपुर के शासक राव मालदेव ने मेड़ता के दुर्ग का निर्माण कराया जिसे मालकोट का दुर्ग कहते हैं, इसी दुर्ग के साथ राव मालदेव ने पोकरण का दुर्ग एवं सोजत के दुर्ग का भी निर्माण कराया

रूठी रानी

मालदेव की पत्नी उमा दे, जो जैसलमेर की रावल लूणकरण की पुत्री थी, जिसको रूठी रानी के नाम से जाना जाता था इसका विवाह 1536 में माल देव के साथ हुआ। विवाह वाली रात मालदेव नशे में चूर होने के कारण वह उमादे के पास न जाकर दासी के पास गया जिससे उमादे पहली रात ही रूठ गई(प्रचलित कथा)

विवाह के प्रथम दिन के पश्चात उमादे ने मालदेव का मुख कभी नहीं देखा उमादे को ही राजस्थान के इतिहास में रूठी रानी के नाम से जाना जाती है।

यह माना जाता है कि विवाह के अवसर पर लूणकरण ने मालदेव की हत्या का षड्यंत्र रचा था जिस की सूचना लूणकरण की रानी द्वारा अपने पुरोहित राघवदेव के माध्यम से मालदेव को दी गई थी और इसी कारण मालदेव और उमादे के मध्य विवाह हुआ। यह भी मनमुटाव का एक कारण रहा होगा।

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उमा दे को मनाने के लिए मालदेव ने अपने भतीजे ईश्वरदास व अपने कवि आसा बारहठ को मनाने भेजा था और उमादे साथ चलने के लिए तैयार हो गई थी लेकिन आसा बारहट ने उमादे को एक दोहा सुनाया-

माण रखे तो पीव तज,पीव रखे तज माण!,दो दो गयंद न बंधही, हैको खंभु ठाण!!

इस दोहे को सुनकर उमादे का आत्म सम्मान जागा और वह जोधपुर नहीं गई।

वह अजमेर तारागढ़ चली गई। रूठी रानी ने अपना वक्त अपने पुत्र राम के साथ अजमेर के तारागढ़ के किले मे बिताया अजमेर मे शेरशाह के आक्रमण की संभावना थी तो उमादे अजमेर से कोसाना ओर वहा से गुंदोज व अंत में केलवा चली गई तथा मालदेव की 1562 मे मालदेव की मृत्यु के उपरांत उमादे मालदेव कि पगडी के साथ ही सती हो गई थी

पति की वस्तु के साथ सती होना अनुमरण कहलाता है

उमादे की सुविधा के लिए मालदेव ने तारागढ़ के किले में पैर से चलने वाली रहट का निर्माण करवाया।

राठौडों के प्रभुत्व में आने से पूर्व बीकानेर का क्षेत्र जांगल प्रदेश के नाम से जाना जाता था जो मारवड़ के उत्तर में स्थित है। महाभारत काल में यह प्रदेश कुरू प्रदेश के अन्तर्गत आता था। मारवाड़ के शासक राव जोधा के छः रानियां व 17 पुत्र थे। जिसमें दूसरे पुत्र बीका ने 1465 में जांगल प्रदेश में राठौड़ वंश की रियासत की स्थापना की तथा 1488 में बीकानेर नगर बसाया।

अतः राव बीका को बीकानेर राज्य का संस्थापक माना जाता है। राव जोधा का सबसे बड़ा पुत्र राव नीबा, राव जोधा के शासन काल में ही स्वर्गवासी हो गया था। दूसरा पुत्र राव बीका ही मारवाड़ का उत्तराधिकारी था लेकिन राव जोधा ने अपनी प्रिय पत्नी/रानी जसमादे के प्रभाव में आकर दूसरे पुत्र राव सातल को जोधपुर का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया।

बीका नाराज हो गया। 1465-66 में करणी माता के आशीर्वाद से राव बीका ने जांगल प्रदेश पर अधिकार कर लिया। बीका के बढ़ते प्रभाव को देखकर राव जोधा घबरा गया व उसको डर था कि कही बीका जोधपुर पर आक्रमण न कर दे किन्तु बीका ने अपने पिता को वचन दिया कि मैं जोधपुर पर कभी आक्रमण नहीं करूगा व जोधपुर रियासत को अपना ज्येष्ठ मानुगा।

राव चन्द्रसेन (1562-1581)

राव चंद्रसेन का जन्म 16 जुलाई 1541 ई.में हुआ । यह मालदेव का तीसरा पुत्र तथा झाला रानी स्वरूप दे का दूसरा (छोटा ) पुत्र था स्वरूप दे ने मालदेव से कहकर अपने पुत्र चंद्रसेन को मारवाड़ का युवराज़ बनवाया था । मालदेव की मृत्यु हुई तब 31 दिसम्बर,1562 में चंद्रसेन मारवाड़ का शासक बना । इसी कारण राव चंद्रसेन के दोनों भाई उससे नाराज हो गए ।

इसे भूला बिसरा राजा, मारवाड़ का प्रताप, प्रताप का अग्रगामी कहते हैं।

मालदेव के बाद चन्द्रसेन गद्दी पर बैठा इससे उसके भाइयों में बैर हो गया राव रामसिंह की प्रार्थना पर अकबर ने मई, 1564 ई. में हुसैन कुली खाँ का भेज जोधपुर पर अधिकार कर लिया। चन्द्रसेन ने भद्राजूण में शरण ली किंतु वहाँ भी अकबर का अधिकार हो जाने के बाद सिवाणा में शरण ली।

अकबर का नागौर दरबार

अकबर वर्ष 1570 में अजमेर यात्रा के लिए आया अजमेर से अकबर 3 नवम्बर ,1570 ई. में नागौर पहुंचा इसी समय अकबर ने नागौर की प्रसिद्द “मस्जिद तारकीन” के समीप एक भव्य दरबार का आयोजन कराया

उस समय यंहा अकाल पड़ा हुआ था । अकाल राहत कार्य के तहत अकबर ने नागौर दुर्ग में एक तालाब बनवाया जिसका नाम शुकर्तालाब रखा गया नागौर में आमेर के राजा भारमल की सहायता से 1570 ई. में नागौर दरबार लगाया गया

जिसमें बीकानेर का कल्याणमल अपने पुत्र रायसिंह के साथ, जैसलमेर का हरराय भाटी, बूंदी व रणथम्भोर का सुर्जन हाड़ा ने यंहा आकर अकबर की अधीनता स्वीकार की राव चंद्रसेन ,राम व उदयसिंह तीनो मारवाड़ से अपनी स्थिति सुधारने के लिए वँहा पहुंचे । चन्द्रसेन नागौर दरबार में उपस्थित हुआ किंतु वँहा पर अकबर के व्यवहार एंव उदयसिंह को देखकर नागौर दरबार को छोड़कर वँहा से वापस चला गया ।

इसका पता अकबर को चला तो 30 अक्टूबर,1572 ई.में बीकानेर के रायसिंह को जोधपुर का अधिकारी नियुक्त कर दिया । राव चंद्रसेन को दबाने के लिए अकबर ने अपनी सेना भाद्राजूण भेजी। भाद्राजूण से चंद्रसेन अपने भतीजे कल्ला (चंद्रसेन के भाई राम का पुत्र) के पास सोजत पहुंचा ।

यंहा पर भी उसका पीछा करते हुए मुगल सेना आ गयी । राव चंद्रसेन वँहा से सिवाणा (बाड़मेर) पहुंचा। सिवाणा से चंद्रसेन सारण के पहाड़ो (पाली) में संचियाप नात्मक स्थान पर पहुंचा जंहा 11 जनवरी 1581 ई. को उसका देहांत हो गया ।

1581 में राव चंद्रसेन की मृत्यु हो जाने के बाद मुगल सम्राट अकबर ने जोधपुर को “खालसा” घोषित कर दिया. जिस पर समस्त अधिकार मुगल सम्राट अकबर के पास रहे,

वंही पर चंद्रसेन की समाधि बनी हुई है जिसके पास इसकी गोर पर सवार प्रतिमा बनी हुई है ,जिसके आगे पांच स्त्रियां भी उत्कीर्ण है । जो अनुमानतः शायद उस समय उसके साथ सती होने वाली पांच रानियों के सतीत्व का प्रतीक है ।

राव चंद्रसेन राजस्थान का पहला वीर था जिसने अकबर के विरुद्ध स्वाधीनता के लिए चुनोती दी ।राव चंद्रसेन को हम”मारवाड़ का प्रताप (विश्ववेश्वर नाथ रेढ़ व रामसिंह सोलंकी ने)/प्रताप का अग्रगामी/विस्मृत नायक/भुला बिसरा राजा (मुहणोत नैणसी ने “दी फोरगेटन हीरो ऑफ मारवाड़”) आदि नामो से जानते है।।

नोट – नागौर में तारकिन मस्जिद का निर्माण दिल्ली के गुलाम वंश के सुल्तान इल्तुतमिश ने कराया, इस मस्जिद पर सूफी संत हमीमुद्दीन का उर्स आयोजित होता है जो दो राज्य का दूसरा सबसे बड़ा मुस्लिम उर्स है।

मोटा राजा उदयसिंह

राव चंद्रसेन के बड़े भ्राता जिन्हें अकबर ने 4 अगस्त 1583 को जोधपुर का शासक बनाया  राव उदय सिंह जोधपुर के प्रथम शासक थे यह मारवाड़ का प्रथम शासक था जिसने मुगल सेवा में प्रवेश किया।

मोटा राजा उदयसिंह ने अपनी पुत्री जगत गोसाई (जोधा बाई / मानी बाई ) का विवाह अकबर के पुत्र शहजादा सलीम ( जहांगीर ) से किया। यह प्रथम मुगल मारवाड़ी विवाह माना जाता है।

1595 में मुग़ल सेनापति के रूप में उदयसिंह का शिवाना पर आक्रमण , शिवाना के जागीरदार कल्ला रायमलोत के नेतृत्व में केसरिया

इसे मोटा राजा की उपाधि अकबर ने प्रदान की

उदयसिंह के पश्चात क्रमशः सूरसिंह व गजसिंह प्रथम शासक रहे

महाराजा जसवंत सिंह प्रथम

इनका राजतिलक आगरा में हुआ

धरमत का युद्ध – मुगल बादशाह शाहजहां के पुत्रों औरंगजेब और दारा शिकोह के मध्य उत्तराधिकार हेतु अप्रैल 1658 में धरमत (उज्जैन, मध्यप्रदेश) में हुआ  जिसमें महाराजा जसवंत सिंह प्रथम ने दाराशिकोह की शाही सेना का नेतृत्व किया था इस युद्ध में औरंगजेब विजय हुआ था

मुहणोत नैणसी महाराजा जसवंत सिंह के मंत्री व साहित्यकार जिन से मतभेद हो जाने पर जसवंत सिंह ने उन्हें कारागार में डाल दिया था उनकी वही मृत्यु हो गई थी नैणसी री ख्यात तथा मारवाड़ रा परगना री विगत नामक दो ऐतिहासिक ग्रंथ लिखे

जसवंत सिंह की मृत्यु जमरूद अफगानिस्तान में 28 नवंबर 1678 को हुई थी इनकी मृत्यु पर औरंगजेब ने कहा था कि आज कुफ्र का दरवाजा टूट गया

जसवंत सिंह की मृत्यु के समय उनके कोई जीवित उत्तराधिकारी ना होने के कारण औरंगजेब ने जोधपुर राज्य को खालसा घोषित कर मुगल साम्राज्य में मिला दिया था

महाराजा अजीतसिंह

जसवंत सिंह के पुत्र जोधपुर के राठौड़ सरदारों द्वारा बालक अजीत सिंह के जोधपुर का शासक बनाने की मांग करने पर औरंगजेब ने इसे टालते हुए अजीत सिंह को परवरिश हेतु दिल्ली बुला लिया वहां इन्हें रूप सिंह राठौड़ की हवेली में रखा गया

वीर दुर्गादास व अन्य सरदारों ने औरंगजेब की चालाकी को भांपकर बालक अजीत सिंह को बाघेली महिला की मदद से औरंगजेब के चंगुल से निकालकर गुप्त रूप से सिरोही के कालिंदी नामक स्थान पर जयदेव ब्राह्मण के घर भेज दिया तथा दिल्ली में एक अन्य बालक को नकली अजीत सिंह के रुप में रखा गया

बादशाह औरंगजेब ने बालक को असली अजीत सिंह समझते हुए उसका नाम मोहम्मदीराज रखा मारवाड़ में अजीत सिंह को सुरक्षित ना देख कर वीर राठौड़ दुर्गादास ने मेवाड़ की शरण ली मेवाड़ महाराणा राजसिंह ने अजीत सिंह के निर्वाह के लिए दुर्गादास को केलवा की जागीर प्रदान की

महाराजा अजीत सिंह ने मुगल बादशाह फर्रुखसियर से संधि कर अपनी लड़की इंद्र कुंवरी का विवाह बादशाह से कर दिया 23 जून 1724 को महाराजा अजीत सिंह की उनके छोटे बेटे बखत सिंह ने हत्या कर दी

वीर दुर्गादास राठौड़

वीर दुर्गादास, जसवंत सिंह प्रथम के मंत्री आसकरण का पुत्र था उसने अजीत सिंह को मुगलों के चंगुल से मुक्त कराया उसने मेवाड़ में मारवाड़ में संधि करवाई

अजीत सिंह ने बहकावे में आकर दुर्गा दास को देश से निकाल दे दिया. तब वे उदयपुर के महाराणा अमर सिंह द्वितीय की सेवा में रहे महाराणा ने उसको रामपुरा का जागीरदार बनाया। दुर्गा दास का निधन 1718 ईस्वी में उज्जैन में हुआ और वही उसकी छतरी बनी हुई है

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ये वीरता एवं स्वामीभक्ति के लिए प्रसिद्ध है। कर्नल टॉड ने दुर्गा दास को “राठौड़ का यूलिसिज” एवं “राजपूताने का गैरीबाल्डी” कहा।

अमर सिंह जोधपुर के महाराजा गजसिंह प्रथम का बड़ा भाई था। जो नाराज होकर शाहजहां की सेवा में चला गया। अमर सिंह को नागौर का शासक बनाया गया। 1644 ई. में शाहजहां साले व मीर बख्शी सलावट खान को गवार कहने पर आगरा में भरे दरबार में उसकी हत्या कर दी गई।

मतीरे की राड़ नामक युद्ध 1644 में-  अमर सिंह राठौड़ बीकानेर के करण सिंह के मध्य लड़ा गया। जिसने अमर सिंह की हार हुई। वीरता के कारणों से आज भी राजस्थान की ख्यालों में स्थान प्राप्त हैं।

दुर्गादास राठौड़ को ‘मरुकेसरी” कहा जाता है। इतिहासकार गौरीशंकर हीराचन्द ओझा ने वीर दुर्गादास राठौड़ को “मारवाड़ का अणबिंदिया मोती” कहा,।

कर्नल टॉड ने दुर्गादास को मारवाड़ दुर्ग की बाहरी दीवार बताया।

महाराजा मानसिंह

यह गोरख नाथ संप्रदाय के गुरु आयस देवनाथ के शिष्य थे आयष देवनाथ ने मानसिंह को महाराजा बनने की भविष्यवाणी की थी  मानसिंह ने जोधपुर में नाथ संप्रदाय के इस महा मंदिर का निर्माण करवाया था

गिंगौली का युद्ध – 1807

मानसिंह व जगतसिंह के मध्य, जगतसिंह के पक्ष में आमिर खां पिंडारी व बीकानेर के सूरतसिंह भी इस युद्ध में लड़े। अंततः परिणाम जगतसिंह के पक्ष में।

16 जनवरी 1818 को उन्होंने अंग्रेजों से आश्रित पार्थक्य की संधि की

बीकानेर के राठोड शासक

1.राव बीका (1465-1504):-

राव जोधा के पुत्र राव बीका ने 1465 ई. में जांगल प्रदेश जीतकर बीकानेर के राठौड़ राजवंश की स्थापना की |  एक मान्यता के अनुसार जांगल परदेश को राव बिका और जाट नेता नरा ने मिलकर जीता, दोनों के नाम पर इसका नाम बीकानेर रखा ।

इस अभियान में राव बिका को करणी देवी का आशीर्वाद प्राप्त हुआ जिससे बिका ने अनेक छोटे बड़े कबीलो को जित लिया। इस प्रकार बीकानेर में राठौड़ वंश की स्थापना हुयी।

बीकानेर की स्थापना-1488 ई. में इन्होंने बीकानेर शहर की स्थापना कर उसे अपनी राजधानी बनाया जो द्वितीय राठौड़ सत्ता का प्रमुख केंद्र बन गया । उसकी मृत्यु होने पर उसका ज्येष्ठ पुत्र नरा बीकानेर माँ स्वामी बना।

इसके पश्चात बिका के दो पुत्र नारा और लूणकरण थे जो बीकानेर के स्वामी बने इन्होंने जैसलमेर पर भी अपना अधिकार जमा लिया

2. राव लूणकरण

नर का देहांत 13 जनवरी 1505 को हो गया। नर के निःसंतान होने से उसका छोटा भाई लूणकरण बीकानेर का शासक बना। राव लूणकरण पिता की भांति साहसी और वीर योद्धा था। उसकी शक्ति का लोहा रुद्रेवा,चायलवाडा आदी स्थानों के सरदार मानते थे, जिनका उसने निजी भुजबल से दमन किया व बड़ा दानी था।

करमचंदवशोकिर्तनम काव्य में उसकी दानशीलता कर्ण से की गई है,  बिठू सुजा ने अपने जैतसी रो छंद में कलयुग का कर्ण कहां है

1526 में धोसा नामक स्थान पर इसकी मृत्यु हो गई थी

3. राव जैतसी (1526-1542 ई.):-

बीकानेर राज्य का प्रतापी शासक एवं राव लूणकरण का पुत्र था इनके समय कामरान ने भटनेर पर आक्रमण किया उस पर अधिकार कर लिया 1534 में राव जैतसी में मुगल सेना पर आक्रमण कर भटनेर को मुगलों से छुड़ा लिया

इस युद्ध का वर्णन बिट्ट सुजा द्वारा लिखित राव जैतसी रो छंद में मिलती है खानवा के युद्ध में राव जैतसी अपने कुंवर कल्याण को सांगा की सहायता के लिए भेजा था

पहोबा/साहेबा- बीकानेर शासक राव जैतसी में मारवाड़ के शासक मालदेव के बीच युद्ध हुआ इस युद्ध में राव जैतसी मारा गया था बीकानेर राज्य की पराजय हुई मालदेव ने बीकानेर का व्यवस्थापक कुंपा को नियुक्त किया था

4.राव कल्याणमल(1544-1574)

1544 में कल्याणमल बीकानेर का राजा बना

राव जैतसी के पुत्र जिन्होंने गिरिसुमेल के युद्ध मे शेरशाह सूरी की सहायता की थी । इस युद्ध के बाद शेरशाह ने बीकानेर राज्य का शासन राव कल्याणमल को सौंपा।

बीकानेर के पहले शासक जिन्होंने 1570 ई. के अकबर के नागौर दरबार मे अकबर की अधीनता स्वीकार की और वैवाहिक संबंध स्थापित किए तथा अपने छोटे पुत्र पृथ्वीराज को , जो उच्च कोटि का कवि और विष्णु भक्त था, अकबर की सेवा में भेजा । इन्ही पृथ्वीराज ने ‘वेलि किसन रुक्मणी री’ की रचना की

अकबर ने 1572 में कल्याणमल के पुत्र रायसिंह को जोधपुर का शासक नियुक्त किया

5. महाराजा रायसिंह(1574-1612)

जन्म : 20 जुलाई 1541 ,  पिता : राव कल्याणमल

उपाधि – राजपूताने का कर्ण महाराजा

नागौर दरबार के बाद 1572 ई. में अकबर ने इन्हें जोधपुर का प्रशासक नियुक्त किया | मुगलो के साथ घनिष्ठ संबंध | हिन्दू नरेशो में जयपुर के बाद बीकानेर से ही अकबर के अच्छे संबंध कायम हुए थे ।

महाराजा रायसिंह ने 1573 में गुजरात के मिर्जा बंधुओं का दमन किया,  1574 में मारवाड़ के चंद्रसेन व देवड़ा सुरताण का दमन किया

1591 में खानेखाना की सहायता के लिए कंधार गया था, 1593 रायसिंह थट्टा अभियान के लिए दानियाल का दमन करने गए, अकबर ने 1593 में जूनागढ़ तथा 1604 में शमशाबाद तथा नूरपुर की जागीर दी, जहांगीर ने रायसिंह का मनसब 5000 जात व 5000 सवार कर दिया

1594 ई. में मंत्री कर्मचंद की देखरेख में बीकानेर किले (जूनागढ़) का निर्माण कराया जिसमे ‘रायसिंह प्रशस्ति’ उत्कीर्ण करवाई | महाराजा रायसिंह को मुंशी देवीप्रसाद द्वारा ‘राजपूताने का कर्ण’ की उपमा दी गयी

‘रायसिंह महोत्सव’ व ‘ज्योतिष रत्नमाला’ की भाषा टीका : महाराजा रायसिंह द्वारा लिखित रचनाएँ |  ‘कर्मचन्द्रों कीर्तनकम काव्यम’ इस ग्रन्थ में महाराजा रायसिंह को राजेन्द्र कहा गया है तथा लिखा है कि वह विजित शत्रुओं के साथ भी बड़े सम्मान का व्यवहार करते थे |

महाराजा रायसिंह की मृत्यु सन 1612 ई. में बुरहानपुर में हुई |

6. दाव दलपत (1612-13)

महाराजा रायसिंह की मृत्यु के बाद दलपत सिह बीकानेर का शासक बना। राव दलपत का सम्राट जहांगीर से मनमुटाव हो गया। जहांगीर ने दलपत को गद्दी से हटाकर उसके भाई सूरसिह को शासक बना दिया।

7. महाराजा कर्ण सिंह (1631-1669)

पिता सुरसिंह के देहावसान के बाद ये सन 1631 में बीकानेर के सिंहासन पर बैठे । ये  बीकानेर के प्रतापी शासक थे मुगल शासक औरंगजेब ने इन्हें जांगलधर बादशाह की उपाधि दी |

मुगल शहजादों मे उतराधिकार संघर्ष के समय कर्णसिहं तटस्थ रहे। लेकिन उन्होंने अपने दो पुत्रों- पद्मसिंह और केसरीसिंह को औरंगजेब की ओर से भेजा ।

मतीरे की राड़ – 1644 में कर्ण सिंह और अमर सिंह के बीच हुई थी जिसमें अमर सिंह विजय रहे । 17 वी शाताब्दी में बीकानेर शासक कर्ण सिंह ने बीकानेर से 25km दूर देशनोक में करणी माता का मंदिर बनाया था ।

कर्णसिंह के काल की रचनाओं मे साहित्य कल्पद्दुम व कर्णभूषण (गंगा नंद मैथिली द्वारा रचित) प्रमुख हैं।

बीकानेर के राठौड़ो की कुलदेवी- करणी माता

8. महाराजा अनूप सिंह –

औरंगजेब द्वारा ‘माही मरातिव’ और महाराजा की उपाधि

 बीकानेरी चित्रकारी का स्वर्ण युग, उस्ता कला को लाहौर से बीकानेर लाने का श्रेय

अनूप संग्रहालय का निर्माण

33 करोड़ देवी देवताओं के मंदिर की संज्ञा वाले बीकानेर के हेरम्भ गणपति मंदिर का निर्माण का श्रेय

9. सूरत सिंह राठौड

हनुमानगढ़ को पहले भटनेर (भट्टी राजपूतों का दुर्ग) कहा जाता था। 1805 ई. में बीकानेर रियासत में शामिल किये जाने के बाद इसको ‘हनुमानगढ़’ का नाम दिया गया था। सूरत सिंह के समय 1805 ई. में 5 माह के विकट घेरे के बाद राठौड़ों ने इसे ज़ाबता ख़ाँ भट्टी से छीना

यहाँ बीकानेर राज्य का एकाधिकार हुआ। मंगलवार के दिन इस क़िले पर अधिकार होने के कारण इस क़िले में एक छोटा सा हनुमान जी का मंदिर बनवाया गया तथा उसी दिन से उसका नाम ‘हनुमानगढ़’ रखा गया।

गंगानगर के सूरतगढ़ शहर तथा बीकानेर के सूरसागर झील के निर्माण का श्रेय

सूरत सिंह ने 1818 ई. में अंग्रेज़ ईस्ट इण्डिया कम्पनी से सन्धि कर ली थी।

10. महाराजा सरदार सिंह –

क्रांति के समय न केवल बीकानेर के महाराजा बल्कि अंग्रेजो की सहायता हेतु बाडलू गाँव (हिस्सार) तक जाने वाले एकमात्र राजस्थानी शासक

11. महाराजा गंगा सिंह –

प. नेहरू द्वारा राजस्थान के भागीरथ की संज्ञा

आधुनिक बीकानेर के निर्माता

अंग्रेजो द्वारा ‘केसर ऐ हिन्द’ की उपाधि

ऊँटो की सैन्य टुकड़ी – गंगा रिसाला

1899 में चीन के साथ अफीम युद्ध में तथा 1900 में दक्षिण अफ्रीका में डचों के विरुद्ध बोआर के युद्ध में अंग्रेजो के साथ

26 अक्टूम्बर 1927 में राजस्थान की प्रथम गंगनहर सिंचाई परियोजना का लोकार्पण

लन्दन में आयोजित तीनो गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने का श्रेय

आधुनिक गंगानगर शहर का निर्माण

1922 से 1928 तक b.h.u. के कुलपति

12. महाराजा सार्दुल सिंह

आजादी एंव एकीकरण के समय बीकानेर के महाराजा दयालदास की बीकानेर राठौड़ों विख्यात में जोधपुर बीकानेर के राठौड़ वंश का वर्णन मिलता है

राठौड़ वंश (Rathore clan)-Education Fact लेख को अंत तक पढ़ने के लिए धन्यवाद, अगर आप हमारे व्हात्सप्प ग्रुप में जुड़ना चाहते है तो यहाँ पर क्लिक करे – क्लिक हियर

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